Sunday, November 14, 2010

सरकार


सरकार कहती है कि
सरकार का
सरकर पर से विश्वास उठ गया है।
डी.सी., एस.पी, एस.डी.ओ, अभियन्ता,
काम नहीं करते,
डाक्टर अस्पताल जाने का नाम नहीं लेते।
शिक्षा में अराजकता व्याप्त है,
अब तो इनकी तन्ख़्वाह
भी पर्याप्त है।
स्कूल, कालेजों में पढाई नहीं होती,
परीक्षा में चोरी किताब खोलकर होती।
डिग्रियां पैसै पर मिलती हैं
कापी किताब की तरह,
दुकान पर बिकती हैं।
अब परीक्षा न्यायालय के,
नियन्त्रण में सही तरीके से
सही वक़्त पर होगी।
वकील, न्यायधीश दूध का दूध
ऒर पानी का पानी करेंगे ;
क्यों कि अब तक ये यही करते आए हैं।
एक भी कहने को नहीं मिलेगा,
कि  न्यायधीश भी बिकते हैं
ओर न्याय पैसै पर मिलता है।
हर्षद मेहता ओर चन्द्रा स्वामी को
कोई वकील नहीं मिल रहा है,
इनकी पैरवी कोई नहीं कर रहा है।
सरकार  बदलते ही,
अफ़सरों की बदली होती है।
इस तरह सरकार के निजी कोष में
वृद्धि होती है।
यू.पी. सरकार,
सारे रिकार्ड तोड़ गयी है।
अपनी माया से
एक सौ तीस करोड़ जोड़ गई है।
मंत्री विदेश जाते ही
विभाग से हटा दिए जाते हैं।
नक्सली जेल जाते ही
पदमुक्त किए जाते हैं।
क्या पता जेल की यातना
इन्हें तोड़ देती हो
पार्टी के गुप्त रहस्य
पुलिस को खोल देते हों।
नक्सली परीक्षण के बाद
पार्टी में ले लिए जाते हैं।
मंत्री, पद से हटते विरोधी हो जाते हैं
सम्वाददाता सम्मेलनों में
सरकार की सारी बखिया
उधेड़ जाते हैं।
अब मंत्री बिना विभागों के होंगे
सारे विभाग प्रधानमंत्री या
मुख्यमंत्री के जिम्मे रहेंगे।
सरकार का
सरकार पर विश्वास तभी होगा
जब सरकार एक व्यक्ति की होगी।
कि अपनी सफलता के लिए
वह खुद जिम्मेवार है।

(3 दिसम्बर, 1995)

नेता


Desh ke Neta!
नेता जी तुम्हें प्रणाम।।                       
आस लगाए नेता रहते,
हो सुखाड़ या बाढ़;
नेता जी के घर में होगी,
रुपयों की बौछार ।
सपरिवार निकल जाएंगे,
घूमने चारों धाम ।।ऩेता जी।।

नेता खोल रहे हैं खाता,
जाके दूसरे देश;
लूट रहे जनता का पैसा,
बदल-बदल कर भेष ।
तुले हुए हैं कर देने पर,
अपना देश नीलाम ।।ऩेता जी।।

सूद का भरपाई हो रहा,
ले विदेश से ऋण;
इनकी माया है ऐसी कि,
होगा न देश उऋण ।
सभी देशों में चर्चा होती,
लगा रहे हैं दाम ।।ऩेता जी।।

जनता की छाती पर नेता,
आज दल रहे मूंग;
चुन कर इनको जनता रहती,
लीला बहुत ललाम ।।ऩेता जी।।

गिरगिट, मेढ़्क, जोंक नाम हैं,
नेता के अनुकूल;
नैतिकता जनता की सेवा,
कब के बैठे भूल ।
गांव-शहर जहां कहीं होते,
करते नींद हराम ।।ऩेता जी।।

दृष्टिगोचर जहां हो करिये,
दूर से ही प्रणाम ;
हैं अगर बचें तो बार-बार,
जपें राम का नाम ।।ऩेता जी।।

 (4 नवम्बर, 1995 )

कविता

कविता मेरी प्यासी है,
भूखी है मेरी कविता।
कविता मेरी नंगी है,
ज़ंगी है मेरी कविता।

सामंतशाहों का खून,
पीती है मेरी कविता।
केवल मज़दूर का नून,
खाती है मेरी कविता।

पद दलितों में स्वाभिमान,
भरती है मेरी कविता।
नदी-नालों में तूफ़ान,
लाती है मेरी कविता।

फ़ैक्ट्र्र्री के मज़दूरों को,
है राह दिखाती कविता।
नन्हे स्कूली बच्चों को,
भी पाठ पढ़ाती कविता।

गॆहूं कहां उपजता है,
यह बतलाती है कविता।
चावल कैसै आता है,
सब समझाती है कविता।

कविता मेरी बोली है,
भाषा है मेरी कविता।
कविता मेरी लाठी है,
गोली है मेरी कविता।
                      (17 दिसम्बर 1995)