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| Desh ke Neta! |
नेता जी तुम्हें प्रणाम।।
आस लगाए नेता रहते,
हो सुखाड़ या बाढ़;
नेता जी के घर में होगी,
रुपयों की बौछार ।
सपरिवार निकल जाएंगे,
घूमने चारों धाम ।।ऩेता जी।।
नेता खोल रहे हैं खाता,
जाके दूसरे देश;
लूट रहे जनता का पैसा,
बदल-बदल कर भेष ।
तुले हुए हैं कर देने पर,
अपना देश नीलाम ।।ऩेता जी।।
सूद का भरपाई हो रहा,
ले विदेश से ऋण;
इनकी माया है ऐसी कि,
होगा न देश उऋण ।
सभी देशों में चर्चा होती,
लगा रहे हैं दाम ।।ऩेता जी।।
जनता की छाती पर नेता,
आज दल रहे मूंग;
चुन कर इनको जनता रहती,
लीला बहुत ललाम ।।ऩेता जी।।
गिरगिट, मेढ़्क, जोंक नाम हैं,
नेता के अनुकूल;
नैतिकता जनता की सेवा,
कब के बैठे भूल ।
गांव-शहर जहां कहीं होते,
करते नींद हराम ।।ऩेता जी।।
दृष्टिगोचर जहां हो करिये,
दूर से ही प्रणाम ;
हैं अगर बचें तो बार-बार,
जपें राम का नाम ।।ऩेता जी।।
(4 नवम्बर, 1995 )

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