Sunday, November 14, 2010

कविता

कविता मेरी प्यासी है,
भूखी है मेरी कविता।
कविता मेरी नंगी है,
ज़ंगी है मेरी कविता।

सामंतशाहों का खून,
पीती है मेरी कविता।
केवल मज़दूर का नून,
खाती है मेरी कविता।

पद दलितों में स्वाभिमान,
भरती है मेरी कविता।
नदी-नालों में तूफ़ान,
लाती है मेरी कविता।

फ़ैक्ट्र्र्री के मज़दूरों को,
है राह दिखाती कविता।
नन्हे स्कूली बच्चों को,
भी पाठ पढ़ाती कविता।

गॆहूं कहां उपजता है,
यह बतलाती है कविता।
चावल कैसै आता है,
सब समझाती है कविता।

कविता मेरी बोली है,
भाषा है मेरी कविता।
कविता मेरी लाठी है,
गोली है मेरी कविता।
                      (17 दिसम्बर 1995)

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